मनुष्य इस लौकिक जीवन के प्रति जागरुक होते हुए परलौकिक (दूसरे लोक) जीवन के प्रति भी अत्यधिक उत्साहित रहा है। वह अपने व्यावहारिक जीवन की अभिव्यक्ति धर्म की भावना और व्यव्हार की नैतिकता से करता रहा है। इस प्रकार स्वर्ग प्राप्त करने के लिए किये जाने वाले कर्म में आस्था पुरुषार्थ के अंतर्गत आता है। मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन के प्रति पारंपरिक रूप से आस्था का भाव इसके बिना असंभव है।
पुरुषार्थ शब्द 'पुरुष' और 'अर्थ' से मिलकर बना है(पुरुष+अर्थ= पुरुषार्थ)।
पुरुष का अर्थ है देहधारी मनुष्य और अर्थ शब्द का अभिप्राय साध्य, लक्ष्य तथा प्रयोजन से है। पुरुषार्थ मनुष्य के जीवन का वह परम लक्ष्य या प्रयोजन है, जिसकी प्राप्ति के लिए वह सदैव प्रयत्नशील तथा क्रियाशील रहता है। पुरुषार्थ मनुष्य जीवन के लक्ष्यों तथा उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक होता है। धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष ये चारों पुरुषार्थ हैं जिनको पुरुषार्थ चतुष्ट्य या चतुर्वर्ग भी कहा गया हैं। इसमें भौतिक(सांसारिक), धार्मिक(नैतिक) तथा आध्यात्मिक(ईश्वरीय) तत्वों आदि का सन्निवेशन(मिश्रण) है।