इस व्युत्पत्ति की दृष्टि से संस्कृति शब्द परिष्कृत कार्य अथवा उत्तम स्थिति का बोध कराता है। वस्तुतः यह शब्द मनुष्य की सहज प्रवृत्तियों, व्यवहारों और उनके परिष्कार का द्योतक है। व्यक्ति के मन, शरीर तथा आत्मा से सम्बन्ध नैसर्गिक शक्तियाँ संस्कृति से ही परिवर्धित और परिष्कृत होती हैं। मन और आत्मा की तृप्ति के लिए मनुष्य जो विकास या उन्नति करता है, वह समग्र रूप से संस्कृति के अंतर्गत आता है। सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् की अभिलाषा एवं संरक्षण ही संस्कृति का प्राण तत्व है। अतः मानसिक क्षेत्र में मानव के प्रत्येक सम्यक् कृति (उत्तम कार्य) संस्कृति के अंतर्गत आते हैं। इसमें मुख्यतः सभी कलाओं, ज्ञान-विज्ञान, धर्म, दर्शन तथा विभिन्न सामाजिक प्रथाओं को ग्रहण किया जाता है।
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