प्राचीन काल से ही वैदिक वाङ्ग्मय संपूर्ण विश्व को विविध उपदेश देता रहा है, इस कारण संस्कृत साहित्य में इसका अत्यधिक महत्व है। संस्कृत साहित्य में वैदिक साहित्य का सर्वोच्च स्थान है। वेदों
भारतीय समाज प्राचीन काल से ही सुव्यवस्थित, सुनियोजित एवं सुगठित सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से संतुलित रहा है। संस्थाओं का विकसित स्वरूप उस समय के भारतीय समाज को शक्तिशाली तथा योजनाबद्ध बना रहा
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति कर्म प्रधान रही है। मनुष्य अपने जीवन में कर्म व श्रम के द्वारा ही उन्नति करता आया है। भारतीय समाज में कर्म को अत्यधिक महत्त्व दिया गया
मनुष्य इस लौकिक जीवन के प्रति जागरुक होते हुए परलौकिक (दूसरे लोक) जीवन के प्रति भी अत्यधिक उत्साहित रहा है। वह अपने व्यावहारिक जीवन की अभिव्यक्ति धर्म की भावना और व्यव्हार की नैतिकता
संस्कृति- संस्कृत भाषा में सम् उपसर्ग, पूर्वक कृ धातु में क्तिन् प्रत्यय के योग से संस्कृति शब्द निष्पन्न होता है। सम् + कृ धातु + क्तिन् प्रत्यय = संस्कृति। इस व्युत्पत्ति की दृष्टि से संस्कृति शब्द परिष्कृत कार्य
आत्मा- आत्मा, परमात्मा से अपृथक उसी के रूप जैसी एक विभूति या तत्व है जो कि चेतन स्वरूप है। गीता में इसे परा (अध्यात्म) प्रकृति कहा गया है जो कि सभी चेतन प्राणियों के भीतर जीवरूप में स्थित है।
मैं नारी हूं व्यक्तिगत हूं में सबकी प्यारी क्यों न समझे मां बाप हमारी? मेरे अस्तित्व को छिपा कर  क्यों मुझे बेटो से नीचे दिखा कर करते हैं उसका गुणगान जो हैं केवल
प्रयोजनमनुद्यिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते। अर्थात मन्दबुद्धि व्यक्ति भी निष्प्रयोजन किसी कार्य में प्रवृत्त नहीं होता। मनुष्य जो भी कार्य करता हैं, उसमें उसका कोई न कोई प्रयोजन अवश्य होता हैं। काव्य प्रयोजन का अर्थ हैं काव्य का